सोमवार, 27 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 28

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पड़ने का भागमरकुस 13 : 1 - 13 

कठिन शब्दों :

1. ढहा दिया जायेगा : 40 सालों के बाद ईस्वी 70 को यह भविष्यवाणी पूरी हुई जब रोमियों ने यरूशलेम पर हमला करके उसे विनाश किया। 

2. दूसरी आयत : शिष्यों ने दो सवालों को पूछा। पहला सवाल था मंदिर के ढहा जाने के विषय में और दूसरा सवाल था यीशु के राज्य का पूरी रीती से इस संसार में स्थापित होना। यीशु ने दूसरे सवाल का उत्तर दिया। वह दिन अभी तक नहीं आया है परन्तु यीशु ने कहा कि हमें सावधान रहना है। 


समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:

1. यीशु ने हमें किस बात पे सावधान रहने को कहा ? क्या यीशु ने जो कहा कि ऐसे लोग आएंगे जो कई लोगों को झूट कहते हुए छलेंगे उसे हम आज होते हुए देखते हैं ?

2. यीशु के राज्य का पूरी रीती से आने के पहले १०वी आयात के अनुसार क्या होना चाहिए। क्या मैं उसकी ओर काम करता हूँ ?

3. यीशु के अनुसार हमारे साथ क्या क्या हो सकता है ? (9 से १३ वि आयत को देखिये ) क्या मैं यह सब सहने को तैयार हूँ ?

4. क्या बोलें कहकर न घबराने कि आज्ञा यीशु ने दिया। इसका क्या कारण दिया यीशु ने ? क्या उस कारण के वजह से मुझे आराम और प्रोत्साहन मिलता है ?


शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 27

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पड़ने का भागमरकुस 12 : 35 - 44 

कठिन शब्दों :
1. दाऊद : वह इस्राएल का सबसे महान राजा था। पुराने नियम में उसके बारे में लिखी गयी है। भविष्यवाणी दी गयी थी पुराने नियम में कि मसीह दाऊद के वंश में पैदा होगा। और वैसा ही हुआ। परन्तु यीशु कह रहे हैं कि हलाकि यीशु शारीरिक रूप में दाऊद से जन्मा , मगर वह दाऊद का भी प्रभु है , या दूसरे शब्दों में वह दाऊद से भी पहले जीवित था , या वह अनंत है। इसका मतलब यही हो सकता है कि यीशु स्वयं परमेश्वर है। 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. धर्मशास्त्रियों का गुनाह क्या था यीशु के अनुसार ? क्या मुझमे भी वही पाप यीशु को दिखेगा ? क्या मैं भी धर्मशास्त्रियों के समान दिखावे के लिए धार्मिक चीज़ों को करता हूँ ?
2. यीशु ने क्यों कहा कि उस विद्वि औरत ने बहुत ज्यादा दिया ?
3. इन दो कहानियों से हमें क्या पता चलता है ? क्या यीशु बाहरी बर्ताव को देखता है या अपने हृदय को ? क्या वह हमारे कार्यों के देखता है या इरादों को ?

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 26

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पड़ने का भागमरकुस 12 : 18 - 34 

कठिन शब्दों :
1. सदूकी : यह यहूदियों का एक संप्रदाय था। और सरे सम्प्रदायों में से सबसे आमिर और प्रभावशाली सदूकियों थे। वे केवल पुराने नियम के पहले पांच किताबों को परमेश्वर का वचन मानते थे। और इसलिए वे पुनर्जीवन को नहीं मानते थे। क्योंकि पुनर्जीवन के बारे में अधिक वचन बाकि किताबों में है। परन्तु यीशु यहाँ उन्हें पुराने नियम के पहले किताब, उत्पत्ति , से ही उन्हें जवाब दिया यहाँ तक की वे कुछ उल्टा न बोल पाए। 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु यहाँ कहते हैं कि पुनर्जीवन है। इसको याद रखते हुए मुझे अपने जीवन को कैसे जीना है ?
2. यीशु ने सदूकियों को कहा कि वे न ही परमेश्वर के वचन को जानते थे और न ही उसके सामर्थ को। क्या मेरे बारे में भी वे वैसा ही कहेंगे ?
3. क्या मैं सच में पुरे मन , जीवन , बुद्धि और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करता हूँ ? ऐसा प्रेम कैसा दिखेगा मेरे रोज़ के जीवन में ?
4. क्या मैं दूसरों को अपने समान प्रेम करता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. हम कई बार परमेश्वर को भजन गाते हैं, आराधना और प्रार्थन करते हैं। पर क्या मैं परमेश्वर को सरे मन के साथ प्रेम करता हूँ ? अगर मैं सांसारिक चीज़ों के लिए 15 साल स्कूल जाता हूँ , और रोज़ दिन में कई घंटे पड़ता हूँ, तो क्या मैं परमेश्वर के वचन को पढ़ने और समझने में काफी समय देता हूँ ? 

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 25

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पड़ने का भागमरकुस 12 : 1 - 17 

कठिन शब्दों :
1. कैसर : कैसर का अर्थ था महाराजा। रोमी शासन में कैसर ही सबसे मुख्य व्यक्ति था। उन दिनों में इस्राएल के ऊपर रोमी शासन चल रहा था। और वह बहुत कठोर और क्रूर था। लोग रोमीयों को नफरत करते थे मगर वे कुछ नहीं कर पाते क्योंकि अगर वे कर नहीं चूकते तो रोमी उन्हें सजा देते। इसलिए अगर कोई भी इस्राएली खुल के कहे कि कर देना चाहिए उसे गद्दार समझते थे और लोगों का क्रोध उसके ऊपर भड़कता। यहाँ पर यहूदियों यीशु को फसाने का कोशिश करते हैं। अगर यीशु कहते कि देना चाहिए तो लोग उस पर गुस्सा करते मगर अगर यीशु कहते की नहीं देना चाहिए तो हेरोदियों (जो कि राजा के लोग थे) के हाथ यीशु फसते। 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. पहला दृष्टान्त से आप क्या समझते हैं ? मेरे पास जो भी है क्या मैं उन चीज़ों का मालिक हूँ या क्या मुझे ये सरे चीज़ें दी गयी हैं ताकि मैं उनका देखभाल करूँ ?
2. क्या मैं यीशु को फ़साने या परखने का कोशिश करता हूँ या नम्रता के साथ उस्की आज्ञा का पालन और उसकी आराधना करता हूँ ?
3. क्या मैं अपने शासन को वो देता हूँ जो देना चाहिए ? या क्या मैं कर देने से बचने का रास्ता निकालता हूँ ?
4. अगर सिक्के में कैसर का चेहरा अंकित है और उत्पत्ति 1:26   के अनुसार हम परमेश्वर के स्वरूप में बनाये गए हैं तो हमें परमेश्वर को क्या देना है ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. पहला दृष्टान्त को यीशु ने यहूदियों के लिए कहा। वे परमेश्वर के लोग थे और उन्हें परमेश्वर ने अपना वचन और अपनी आज्ञाएं दी थी। मगर यहूदी लोग अपने आप को खास समझने लगे ये भूलते हुए कि उन्हें जो कुछ था वो परमेश्वर कि दया से था। वे परमेश्वर का भी आदर पुरे दिल से नहीं करते थे मगर अपने आप को धार्मिक और प्रभु के खास लोग के समान दिखते थे। दूसरे शब्दों में वे घमंडी हो गए थे।

मगर जब परमेश्वर ने अपने दासों को भेजा उनके मध्य में वे उन्हें मरते थे और परमेश्वर का आदर नहीं करते थे। यीशु परमेश्वर का इकलौता पुत्र है। और जब उसे भी परमेश्वर ने भेजा तो उन लोगों ने उसे मारा।

क्या मेरे जीवन में परमेश्वर ने जो सत्य दिया है उसे मैं नम्रता पूर्वक लोगों से बांटता हूँ या घमंडी हो कर लोगों कि निंदा करता हूँ ?

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 24

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पड़ने का भागमरकुस 11 : 20 - 33 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. प्रार्थना करने से पहले मुझे क्या करना चाहिए ?
2. याजकों और धर्मशास्त्रियों किन से ज्यादा डरते थे - परमेश्वर से या लोगों से ? या दूसरे शब्दों में वे किनको खुश रखने का प्रयास ज्यादा करते थे ? क्या मैं भी उनके समान हूँ इस विषय में ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. याजकों और धर्मशास्त्रियों ने यीशु का अधिकार को नहीं माना। क्या मैं यीशु के अधिकार को मानता हूँ मेरे जीवन को साफ करने के लिए ? क्या मैं यीशु को पूरा इजाज़त दिया हूँ की वह मेरे जीवन को कैसे भी तरह से सुधरे ?

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 23

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पड़ने का भागमरकुस 11 : 12 - 19 

कठिन शब्दों :
1. मन्दिर में : यह मंदिर का बहरी आंगन था। अगर गैर यहूदियों परमेश्वर कि आराधना करना चाहते थे, तो वे लोग यहाँ पर परमेश्वर कि आराधना करने आ सकते थे। परन्तु उन समयों में यहूदियों गैर यहूदियों को मंदिर आने से मन करते हुए, वहां पर अपना धंधा चलने लगे। जो भी लोग आराधना के लिए आते थे उन्हें कई बार कुछ जानवर या चिड़िया लेन कि जरुरत थी बलि के लिए। इसलिए बलि के लिए जानवरों और चिड़ियों को बेचने का धंधा चल रहा था। 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. अंजीर का पेड़ में सिर्फ फल होने की ऋतू में ही पत्ते निकल आते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो अगर पत्ते दिखे तो उसका मतलब है कि फल भी होना चाहिए। क्या मेरे जीवन में भी फल का दिखावा है मगर फल नहीं ? (मतलब मैं कई चीज़ें करता हूँ जो लोग को दिखे कि मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ लेकिन मेरे मन में बुरी चीज़ें हैं)?
2. जहाँ पर आराधना हो रहा था वहां पर लोग अपने ही भलाई के लिए धंधा चला रहे थे। क्या मेरे जीवन में भी जहाँ आराधना होना चाहिए वो नहीं हो रहा है मगर अपना ही बढ़ाई हो रहा है ?
3.  जब यीशु मेरे गलितयों को सुधारता है , तो क्या मैं याजकों के समान उस पर गुस्सा करता हूँ या क्या मैं अपना गलती स्वीकार करके अपने आप को सुधरने का प्रयास करता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. मंदिर में रोज़ बलि चढ़ाई जा रही थी मगर किसा का भी मन प्रभु कि ओर नहीं था , वैसे ही जैसे अंजीर के पेड़ में पत्ते थे मगर फल नहीं। हो सकता मेरे जीवन में भी प्रार्थना हो और कई धार्मिक चीज़ें हो, पर हो सकता है की प्रभु मेरे जीवन में न हो। 

रविवार, 19 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 22

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पड़ने का भागमरकुस 10: 45 - 11 : 11 

कठिन शब्दों :
1. दाऊद का पुत्र : पुराने नियम में भविष्यवाणी हुई थी कि जो मसीह आएगा वो दाऊद के वंश का होगा। तो इसलिए उसको दाऊद का पुत्र से भी जाना जाता था। यहां पर वह भिकारी जब यीशु को दाऊद का पुत्र के नाम से पुकारता है तो वह यह बात को स्वीकार करता है और विश्वास करता है कि यीशु ही वो मसीह है जिसके बारे में भविष्याणि दी गई थी। 

2. गधी के बछेरे : जकर्याह 9:9 में भविष्यवाणी दी गयी थी कि मसीह एक गाढ़ी के बछेरे में सवारी करते हुए आएगा। यह भी परमेश्वर के वचन का पूरा होने को दर्शाता है। 

3. होशन्ना : इस शब्द का अर्थ है, प्रभु हमें बचा या प्रभु हमारी सहायता कर।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. जा आस पास के लोग उस बर्तीमाई को डांटा और चुप कराने का कोशिश किया तो फिर भी वह और जोर से प्रभु कि ओर पुकारता रहा। क्या मैं भी इसके समान औरों की नहीं डरते हुए परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करता हूँ ?
2. यीशु के अनुसार उस बर्तीमाई का उद्धार किस सिद्धांत के आधार पे हुआ ? मेरा उद्धार कैसे हो सकता है ? क्या मेरे खुद के अच्छे कामों या मेहनत से या विश्वास से ?
3.  यरूशलेम के लोग यीशु का स्वागत किये। क्या मैं यीशु का मेरे दिल में स्वागत करने को तैयार हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. यीशु का यरूशलेम प्रवेश करना हज़ारों साल पहले दी गयी भविष्याणि के अनुसार हुआ। अगर परमेश्वर का वचन सच होता है, तो क्या मैं उसे उतना ही निश्चयता के साथ पढता हूँ और क्या मेरा उस पर पक्का भरोसा और विश्वास है ?

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 21

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पड़ने का भागमरकुस 10: 32 - 45 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु का इस संसार में आने का उद्देश्य दिया हुआ है इस भाग में। वह उद्देश्य क्या था ?
2. उस उद्देश्य को मन में रखते हुए देखिये यीशु के साथ क्या होने वाला था जो उन्होंने शिष्यों को समझाया। इस बात को जानते हुए क्या मुझे यीशु के प्रति प्रेम जागृत होता है ?
3. यीशु चेलों से कहते हैं कि उन्हें इस संसार के समान नहीं रहना चाहिए। किस विषय में इस बात को कहते हैं ? यीशु के चेलों को कैसा होना चाहिए ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. यीशु के अनुसार किसी कि सेवा करने का अर्थ क्या था ? सेवा करने के लिए यीशु ने औरों के लिए क्या किया ? अगर मुझे लोगों की सेवा करना है तो मुझे क्या करना होगा ?

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 20

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पड़ने का भागमरकुस 10: 17 - 31 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. एक धनवान व्यक्ति का भरोसा किस पर रहता है ? क्या खुद के धन पे या परमेश्वर पे ? इन सवालों के सन्दर्भ में विचार कीजिये यीशु ने क्यों कहा होगा की एक धनवान व्यक्ति को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना बहुत कठिन है ?
2. क्या मैं उस धनवान व्यक्ति के समान अपने आप को अच्छा समझता हूँ ?
3. इस भाग से परमेश्वर के राज्य का प्रवेश करने के विषय में आप क्या समझते हैं ? क्या खुद के मेहनत से परमेश्वर के राज्य को प्रवेश किया जा सकता है जैसे उस धनवान व्यक्ति ने प्रयास किया ? यह बात किसके द्वारा संभव है ?
4. क्या मुझे यीशु के पीछे होने के लिए कुछ खोना पढ़ रहा है, हो सकता है धन या परिवार के साथ अच्छा रिश्ता (क्योंकि वे विरोध करते हैं) या दोस्तों की दोस्ती (क्योंकि मैं अब उनके साथ बुरी चीज़ें नहीं करना चाहता) ? यीशु ने मेरे लिए 30वि आयत में क्या वायदा दिया ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. ३०वी आयत में यीशु वायदा देते हैं कि जो कोई यीशु के लिए कुछ त्यागता है उसके लिए बहुत अच्छी चीज़ें मिलेंगी। परन्तु वे सब यातना के साथ मिलेंगी। क्या मैं इन यातनाओं को सहने को तैयार हूँ ?
2. यह परिवार जो यीशु कहते हैं हमें मिलेगा अगर हमें यीशु के लिए परिवार त्यागना है , वो परिवार कहाँ मिलेगा ? क्या हो सकता है कि यीशु चर्च (कलीसिया) कि बात कर रहे हैं ? क्या मैं संगति में जाता हूँ ?

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 19

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पड़ने का भागमरकुस 10: 1-16 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. क्या मैं भी फरीसियों के समान अक्सर पूछता हूँ - क्या मैं ये कर सकता हूँ या क्या मैं वो कर सकता हूँ ? बल्कि मुझे पूछना चाहिए कि परमेश्वर मेरे जीवन से क्या चाहता है ? परमेश्वर कि इच्छा जानने का प्रयास करें न कि मेरा अधिकार। किन किन विषयों पर मैं ऐसा सोचता हूँ ?
2. परमेश्वर के अनुसार ब्याह का उद्देश्य क्या था ? क्या तलाक करना उचित है ?
3. बच्चों का विश्वास किस प्रकार होता है ? उनके और बड़ों के विश्वास में क्या अंतर है ? क्या मैं भी बच्चों के समान साफ मन से विश्वास करता हूँ ?
4. जब छोटे से छोटे बच्चों को यीशु अपने पास बुलाये और आशीषित किये, तब क्या मुझे यीशु के पास जाने में संकोचना सही है ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. आज कि दुनिया में लोग के कई प्रकार के विचार हैं ब्याह के विषय में। पुरुष और पुरुष या स्त्री और स्त्री एक दूसरे  से ब्याह करते हैं। यीशु का इस विषय में क्या शिक्षा था ?

बुधवार, 15 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 18

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पड़ने का भागमरकुस 9 : 30 - 50 

कठिन शब्दों :
1. नमक : इस्राएल में जो नमक का उपयोग होता था वो मृत सागर से आता था और उसमे कई अशुद्धताएं थीं। इसकी वजह से कई बार उसकी नामकीनपन चली जाती थी।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु चेलों को अकेला सिखाते हैं। क्या मुझे यह जानकर प्रोत्साहन मिलती है कि यीशु जितना कि भीड़ क्यों न हो अपने चेलों के लिए उनके पास अलग सा समय है ?
2. रास्ते में चेलों के सोच विचार से उनके बारे में क्या पता चलता है ? क्या वही स्वार्थी स्वभाव के कारण वे ३८वे वचन में उस व्यक्ति को रोखने का प्रयास किये ?
3. यीशु के अनुसार हम में कैसा स्वभाव होना चाहिए ? क्या मैं औरों का सेवक बनने को तैयार हूँ ?
4. पाप के विषय में यीशु कितने गंभीरता के साथ शिक्षा दिए ? क्या मैं पाप को उतना ही गंभीर लेता हूँ ? क्या पाप को हटाने के लिए मैं अपने जीवन से कुछ भी हटाने को तैयार हूँ ? हाथ पैर शायद काटना नहीं पड़े पर अगर मैं अपने फोन के कारण पाप कर रहा हूँ क्या मैं अपना फोन के बिना रह सकता हूँ ?
5. मुझे अपने जीवन से पाप हटाने के लिए क्या हटाना होगा ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. परमेश्वर कि सेवा में हर किसी का योगदान जरुरी है। भले वो आदमी छोटा से छोटा काम क्यों न कर रहा हो। यीशु कहते हैं अगर हम प्रभु के लोगों को पानी भी पिलाये वो बड़ी बात है। परमेश्वर के सेवा में मेरा क्या योगदान है ?

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 17

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पड़ने का भागमरकुस 9 : 14 - 29 


समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इतने सालों से अपने बेटे कि हालत को देखते हुए उस पिता का अनुभव कैसा रहा होगा ? कल्पना कर के देखिये।
2. जब यीशु ने उस पिता के अविश्वास को दिखाया तो उस पिता का प्रतिक्रिया क्या था ? क्या मैं भी उसके जैसे प्रार्थना कर सकता हूँ ?
3. जब कुछ समस्या का हल ही नहीं आ रहा हो, तो क्या मैं प्रार्थना करता हूँ या निराश हो जाता हूँ ?

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 16

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पड़ने का भागमरकुस 9 : 1 - 13 

कठिन शब्दों :
1.एलिय्याह और मूसा: मूसा और एलिय्याह पुराने नियम के दो महत्वपूर्ण भविष्यद्वक्ता थे। पुराने नियम में परमेश्वर के भविष्यवाणी द्वारा कहा गया था कि मसीह के आने से पहले एलिय्याह आएगा। परन्तु उसे समझने का अर्थ है कि एलिय्याह के आत्मा में एक व्यक्ति आएगा। और 13वे वचन में जब यीशु कहते हैं कि एलिय्याह आ चूका है वे बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना कि बात कर रहे हैं।


समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इस भाग में दिए हुए दर्शन से हमें यीशु के बारे में क्या पता चलता है ? यीशु कौन है ? स्वर्ग से जो वाणी आयी , वो किसकी वाणी थी ?
2. इस भाग में हम यीशु के बारे में कुछ सीखते हैं। अगर यीशु वाकय में वही है, तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। उस वाणी ने चेलों को क्या कहा ?
3. क्या मैं अपने रोज़ के जीवन में यीशु की महिमा को स्मरण करता हूँ ? और क्या मैं यीशु की सुनता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. पुरे मरकुस के किताब में हमने कितने बार यीशु के बारे गवाही सुना है ? यीशु कौन है ? अगर मैं इस सवाल का जवाब जानूंगा तो और उसे अपने जीवन में महसूस करूँगा तो क्या मेरा जीवन का चल बिलकुल अलग नहीं  होगा ?
2. यूहन्ना , जिसके बारे में यीशु बात कर रहे हैं १२वे वचन में, उसे मार दिया गया था। यीशु जानते थे कि उन्हें भी कई यातनाएं साहनी पड़ेगी। उसे जानते हुए भी यीशु अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे। हमने कुछ दिन पहले देखा कि यीशु का चला बनना है तो अपना क्रूस उठा के उसके पीछे हो लेना है। यह बात जानते हुए कि मुझे भी अपने जीवन में कष्ट उठाना है , क्या मैं यीशु के समान निडर होकर आगे बढ़ सकता हूँ ?

रविवार, 12 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 15

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पड़ने का भागमरकुस 8 : 27 - 38 

कठिन शब्दों :
1.मसीह : यहूदियों का विश्वास था कि एक मसीह आएगा जो परमेश्वर कि ओर से होगा और बड़े बड़े काम करेगा और इस्राएल को बंधन से छुड़ाएगा। परन्तु उनके अनुसार मसीह एक राजा के समान आकर महान व्यक्ति होकर समझते थे। इसलिए जब चेले स्वीकार कर लेते हैं कि यीशु मसीह है तो उनके समझ को सुधरने के लिए यीशु कहते हैं कि उन्हें यातनाएं उठानी होंगी और उन्हें मर दिया जायेगा।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. लोग यीशु के बारे में बहुत कुछ समझ सकते हैं। पर मेरे जीवन में मेरे अनुसार यीशु कौन है ? क्या मैं उसे अच्छे से जानता हूँ ?
2. क्या मैं अपने जीवन में प्रभु के बातों से सरोखर रखता हूँ ? या शैतान के बातों से ? शैतान का रास्ता आसान था। यातनाएं नहीं उठाना, और आराम से जिंदगी जीना। पर क्या मैं परमेश्वर के कामों से सरोखर रखता हालांकि वो ज्यादा कठिन क्यों न हो ?
3. मुझे अगर यीशु का चेला बनना है तो मुझे क्या करना होगा ? क्या मैं यीशु का चेला बनने को तैयार हूँ ?
4. इन वचनों के अनुसार जीवन किस से मिलती है ?
5. क्या मैं परमेश्वर के नाम से लजाता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. मैं सब कुछ खोने को तब तैयार होऊंगा जब मैं समझूंगा कि उसे खोने से भी जो लाभ मिलेगा वो वाकय में उतना ज़्यादा लाभदायक है। क्या मैं अनंत जीवन को, यीशु के साथ संगति को, उसका चेला बनने को उतना लाभदायक समझता हूँ ?
2. सब कुछ त्याग कर क्रूस उठाने का क्या अर्थ है ? क्या मैं अपने जीवन में सब कुछ खोने को तैयार हूँ ? क्या मैं पैसे खोने को तैयार हूँ, क्या दोस्तों को खोने को तैयार हूँ , क्या रिश्तों को खोने को तैयार हूँ , क्या सम्मान, क्या इज्जत , क्या धन सम्पत्ति , क्या अच्छी नौकरी , कपडे मकान , यहाँ तक की जान भी , क्या मैं सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ ? क्या मैं वास्तव में यीशु का चेला बनने को तैयार हूँ ?

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 14

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पड़ने का भागमरकुस 8 : 14 - 26 

कठिन शब्दों :
1. हेरोदेस : हेरोदेस वहां का राजा था।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. क्या उस अंधे की ऑंखें एक ही बार में  पूरी रीती से खुल गयीं ? क्या एक ही बार में मेरे प्रार्थनाओं का जवाब हमेशा मिलेगा ?
2. २१वि वचन में यीशु किस चीज़ को समझने कि बात कर रहे हैं ? अगर चेलों को याद रहता यीशु ने कितनों को कितना कम रोटी से खिलाया तो क्या वे रोटी या खाने को लेकर चिंता करते ?
3. यीशु चेलों से पूछते हैं अगर उनको याद है यीशु ने क्या किया। क्या यीशु के भलाई जो मेरे जीवन में हुआ है क्या मैं उसे याद रखता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. जैसे उस अंधे कि ऑंखें धीरे धीरे खुली वैसे ही मेरी आत्मिक ऑंखें भी धीरे धीरे खुल सकते हैं। चेलों को यीशु के बारे में समझने में समय हुआ। तो क्या मुझे निराश होना है अगर विश्वास में पूरी तरह से तुरंत बढ़ न जाऊं ?

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 13

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पड़ने का भागमरकुस 8 : 1 - 13 

कठिन शब्दों :
1. आश्चर्य चिन्ह : यहूदी लोग का विश्वास था कि जब मसीह आएगा तो वह जितना बड़ा आश्चर्यकर्म मूसा ने किया उससे भी बड़े बड़े काम करेगा। मूसा ने पुरे इस्राएली लोगों को 40 सालों के लिए खिलाया, हलाकि उसने नहीं परन्तु परमेश्वर ने मूसा के द्वारा। फरीसि लोग यीशु से चिन्ह इसलिए मांग रहे थे या दूसरे शब्दों में वे यीशु को अपने आप को मसीह साबित करने को कह रहे थे जो एक बहाना था क्योंकि वे विश्वास करने को तैयार ही नहीं थे। उनके अनुसार 400 लोगों को एक बार खिलाना छोटी बात थी अगर मूसा के कामों से तुलना किया जाये तो।
2. चार हज़ार पुरुष : इसरायली परंपरा के अनुसार महिलाओं और बच्चों को नहीं गिना जाता था तो कुल संख्या और बहुत ज्यादा हुआ होगा।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु को भीड़ को देखकर क्या भावना महसूस हुआ ?
2. जब चेलों ने कहा कि इतनों के लिए खाना खिलाना मुश्किल होगा तब यीशु ने क्या सवाल पूछा ? अगर मुझे लगता है कि इतना बड़ा चीज़ करना मुश्किल है मुझे पूछना है मेरे पास यही क्या है। जब चेले जो उनके पास था उसको देने को तैयार हुए तब यीशु ने उसे आशीषित करके लोगों को खिलाया। क्या मैं मेरा पास जितना है भले कम क्यों न हो, क्या मैं उसे देने को तैयार हूँ लोगों के लिए ?
3. क्या मुझे यीशु के सामर्थ्य पे कभी शक करना है ?

और गहरी सोच  के लिए:
1.यीशु सिर्फ लोगों के आत्मिक जीवन पर ही चिंतित नहीं था परन्तु उनकी शारीरिक जरूरतों को भी संभालता था।  क्या मैं लोगों के प्रति ऐसी मनसा रखता हूँ ?

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 13

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पड़ने का भागमरकुस 7 : 24 - 37 

कठिन शब्दों :
1. यूनानी : यहूदी लोग यूनानी को नीच समझते थे। उनके अनुसार जो भी व्यक्ति यहूदी नहीं था, वह प्रभु के आशीष के हक़दार नहीं था। वे उन्हें कुत्ते की तरह समझते थे। पर वे गलत थे। उस स्त्री कि बेटी को ठीक करते हुए यीशु यहाँ दिखा रहे  हैं कि यहूदी हो या यूनानी यीशु सब के लिए है।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. उस स्त्री को लगा कि गिरे हुए चुरचार समान थोड़ा सा आशीष भी काफी था उसकी बेटी के ठीक होने के लिए। क्या मुझमे इतना विश्वास है ?
2. उसे कुत्ते से तुलना जब किया गया, तब उस स्त्री ने कुछ नहीं किया परन्तु स्वीकार कर लिया। क्या मैं उतना नम्र हूँ कि यीशु के सामने झुक के जाऊं ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. क्या मैं यीशु के कार्यों को देख कर आश्चर्य से भर जाता हूँ और क्या मैं उसकी आराधना करते रहता हूँ ?

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 12

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पड़ने का भागमरकुस 7 : 1 - 23 

कठिन शब्दों :
1. पुरखों की रीति / परंपरा : बाबुल कि निर्वासन के बाद , यहूदी धर्मशास्त्रियाँ लोगों के लिए बहुत सरे नियम बनाये। परमेश्वर के नियमों को रोज़ के व्यावहारिक जीवन में कैसे लागु किया जाये - इस बात को समझने के लिए उन्होंने अपने समझ से कई परम्पराएं और रीती रिवाज बनाये। ये नियमों को शुरुआत में लाये जाने के इरादे गलत नहीं थे। परन्तु ये परमेश्वर का वचन नहीं था और कहीं कहीं फरीसी लोग इन परम्पराओं को परमेश्वर के वचन से और अधिक मुख्यता देने लगे। वो बात गलत था।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. आपके अनुसार क्या कुछ भी खाने से लोग अशुद्ध हो सकते हैं ? यीशु के अनुसार लोग अशुद्ध किस चीज़ से होते हैं ?
2. क्या हमारे जीवन में हम कभी कभी रीती रिवाज़ों को ज्यादा ध्यान देते हुए प्रभु को भूल जाते हैं ? हमें परमेश्वर का वचन को पढ़ते हुए सही रीती से समझ कर ही कुछ भी चीज़ करना है।

और गहरी सोच  के लिए:
1. पुराने धर्मशास्त्रियों जिन्होंने पहले इन नियमों को बनाया उनका इरादा सही था। मगर वे परमेश्वर के ववचन को सच्ची रीती से नहीं समझ पाए। तो परमेश्वर का वचन को सावधानी के साथ समझने का प्रयास करना है और लोगों से भी जांचना है की हमारी समझ सही है या नहीं। 

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 11

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पड़ने का भागमरकुस 6: 32 - 56 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इन दो घटनाओं से यीशु के बारे में क्या पता चलता है ? क्या कोई साधारण मनुष्य ये सब कर सकता है ? तो फिर यीशु कौन है ?
2. लोग बहुत मुश्किल होने के बावजूद बहुत दूर चल कर गए ताकि वे यीशु से सिख सके। क्या मैं यीशु से सिखने के लिए उतना ही उत्सुक हूँ ?
3. दिन भर सीखाने के बाद यीशु बहुत थक गए हुए होंगे। पर फिर भी वे अकेले प्रार्थना करने को गए। क्या मैं भी प्रार्थना करने के लिए समय निकलता हूँ ?
4. जब शिष्यों ने यीशु को जितना उनके पास था उतना दिया , तब यीशु ने उसके द्वारा बहुतों को आशीषित किया। शायद मुझे लगता है कि मेरे पास तो उतना कुछ है नहीं और मैं सोचता हूँ इससे क्या होने वाला है , पर क्या मैं उसे यीशु को देने को तैयार हूँ ? वह उसके द्वारा लोगों को आशीषित करेगा।

और गहरी सोच  के लिए:
1. ५२वे वचन में लिखा है कि चेले समझ नहीं पाए थे। क्या मैं भी वैसे कभी हो जाता हूँ कि यीशु के चमत्कार को देखने के बावजूद उसको शक करने लगता हूँ कभी कभी ?

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 10

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पड़ने का भागमरकुस 6: 1 - 31 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. शिष्यों के प्रचार में और यूहन्ना के प्रचार में एक समानता है। वह समानता को ढूंढिए।
2. यीशु ने जब शिष्यों को दो दो में भेजा तो उन्हें कुछ निर्देश दिया कि खाना नहीं लें और न कोई धन। अगर पैसा होता तो अपने पैसे पर भरोसा करते मगर अब उनका एकमात्र भरोसा कौन है ? क्या मुझे यीशु पर उतना विश्वास है कि मैं यीशु के बातों को इतना मन सकूँ ?
3. हेरोदेस यूहन्ना से क्यों डरता था ? यूहन्ना के बारे में उसका क्या विचार था ? दुश्मन तो दूर कि बात है, क्या कम से कम मेरा दोस्त मेरे बारे में वैसा बोलेगा ?
4. यूहन्ना के जीवन में सही बात को बोलने का क्या परिणाम था ? यूहन्ना बहुत दिन जेल में होने के बावजूद सच बोलना बंद नहीं किया। क्या मुझे सही बात बोलने का हिम्मत है ?
5. जब शिष्य वापस आये तो यीशु ने उनको क्या कहा ? इससे यीशु के बारे में क्या पता चलता है ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. यीशु के नगर के लोगों ने यीशु को बहुत देखा होगा। शायद इसलिए वे उस पर ज्यादा विश्वास नहीं किये। जो आश्चर्य दूसरे जगहों में था यीशु के प्रति वो नहीं था यहाँ। क्या मैं यीशु के बारे में इतना अधिक सुना हूँ कि मेरा उसके प्रति विश्वास कम हो गया ?
2. हेरोदेस ने कई बार वचन को सुना मगर उसने पश्चाताप नहीं किया। यूहन्ना और शिष्यों दोनों का सन्देश वही था। क्या मैं भी हेरोदेस के समान अक्सर वचन को सुनता हूँ मगर अपने जीवन में उसे लागु नहीं करता हूँ ?

रविवार, 5 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 9

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पड़ने का भागमरकुस 5: 21 - 43 

कठिन शब्दों :
1. यहूदी आराधनालय का अधिकारी: यह एक आम आदमी (अर्थात वह जो पंडित समान नहीं) था जिसको आराधनालय का देख रेख तथा उसे सँभालने कि ज़िम्मेदारी थी।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इस भाग में दो जन यीशु के पास आते हैं।  यह दो कौन है और उनकी स्तिथि क्या है ?
2. उस स्त्री के विचार से आप उसके बारे में क्या समझते हैं ? उस स्त्री के पास जितना निश्चयता था यीशु के ऊपर क्या उतना निश्चयता मुझे है ?
3. ३६वी वचन में यीशु क्या कहते हैं ? अगर एक व्यक्ति विश्वास करे तो वह क्या नहीं करेगा ?
4. इन दो घटनाओं से आप यीशु के बारे में क्या सीखते हैं ? आपके समझ के अनुसार यीशु कौन है ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. जब दोनों याईर और वह बीमार स्त्री यीशु के पास आये तो उनकी मन दशा कैसी थी या दूसरे शब्दों में वे यीशु के पास कैसी रवैया में आये ? मैं जब यीशु के पास जाता हूँ, तो कैसे जाता हूँ ?
2. क्या दोनों के पास कोई और उपाय था ? जब हम समझेंगे कि यीशु के आलावा हमारे पास कोई और उपाय नहीं है तब हम भी उनकी तरह नम्रता सहित यीशु के पास जायेंगे।
3. क्या आपको कभी लगता है कि बड़ी भीड़ में आपको कोई नहीं देखेगा ? जब भीड़ बहुत बड़ा था, तब क्या यीशु ने एक व्यक्ति को नहीं खोजा। इसे जानकर आपको कैसा लगता है ? यीशु के बारे में आपकी समझ कैसे बदला है ?

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 8

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पड़ने का भागमरकुस 5:1 - 20 

कठिन शब्दों :
1. दिकपुलिस: इस शब्द का अर्थ है 'दस शहरों।'झील के उस पर यह देश शहरों एक अलग देश के समान रहते थे। 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. जिस व्यक्ति के अंदर दुष्टात्मा थी, उसकी क्या स्तिथि थी ? वह कहाँ रहता था, और कैसे रहता था ?
2. उस दुष्टात्मा भरी व्यक्ति को छूटकरा किसके द्वारा मिला ? मुझे छुटकारा के लिए किसके पास जाना है ?
3. उस दुष्टात्मा भरी व्यक्ति को यीशु के साथ मुलाकात करने के बाद उसका जीवन कैसा बदल गया ? क्या मेरे जीवन में यीशु से मिलने के बाद कोई बदलाव आया है ?
4. क्या उस व्यक्ति के समान मैं भी लोगों को बताता हूँ कि यीशु ने मेरे जीवन में कैसे महान काम किये हैं ?
और गहरी सोच  के लिए:
1. दुष्टात्मा भरी व्यक्ति और गाओं के लोगों ने यीशु को अलग निवेदन किया यीशु के चमत्कार होने के बाद। मेरी निवेदन यीशु के प्रति किसके समान है ?
2. कल के भाग में यीशु के चेले उसके बारे में सवाल उठाते हैं कि यह कौन है। यहाँ पर दुष्टात्मा को पता है यीशु कौन है। जब दुष्टात्मा तक जनता है यीशु कौन है, क्या मैं उसे स्वीकार करता हूँ ?

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 8

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पड़ने का भागमरकुस 4:35 - 41 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. झील के दूसरे पर जाना किसका विचार था ?
2. जब तूफान / बवंडर हुआ और यीशु सो रहा था तो शिष्यों को कैसा लगा होगा ?
3. शिष्यों के आखरी सवाल पर आपका क्या विचार है ? आखिर यह यीशु है कौन ? आपका जवाब क्या है ?
4. मेरे जीवन में जब तूफान या बवंडर आती है तो मुझे क्या करना होगा ?
और गहरी सोच  के लिए:
1. यीशु से मिलने से पहले इन चेलों का काम क्या था ? उस काम को जानते हुए, क्या समझ में कोई बढ़ोतरी है ?
2. जब हवा और पानी तक की यीशु की आज्ञा को मानते हैं तो मुझे और कितना ही ज्यादा उसकी आज्ञा को मानना है ?
3. ४०वी वचन के अनुसार अगर विश्वास होगा तो क्या नहीं होगा ?

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 7

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पड़ने का भागमरकुस 4:21 - 34 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. दिया को कहाँ रखा जाता है और उसका ऊद्देश्य क्या है ? कल के भाग में हमने देखा कि दृष्टान्त के बारे में यीशु ने कहा कि लोग देखें और देखते ही रहें, पर उन्हें कुछ सूझे नहीं। इन दोनों विचारों को आप कैसे समझते हैं ? आप जो वचन से सीखे हैं उसे अगर दिया समझेंगे तो उस ज्ञान से आप क्या करते हैं ? क्या आप उसे छिपाते हो या ऊपर रखते हो ?
2. किसान अपना मेहनत तो करता है मगर क्या वह किसान अनाज को उपजता है या क्या परमेश्वर की आज्ञा से धरती अपने आप उपजता है ? क्या मुझे अपने मेहनत पे करना है या परमेश्वर पर ?
3. अगर किसी चीज़ कि शुरुआत छोटी हो, तो क्या उसका मतलब है कि वो छोटा ही रहेगा ? परमेश्वर का राज्य का शुरुआत कितने लोगों से हुआ (दो दिन पहले हमने इसे देखा)

और गहरी सोच  के लिए:
1. जब दिया अपने काम को करता है, तो क्या होता है ? (२२वी वचन को देखिये)
2. बीज के दृष्टान्त में धरती अपने आप बीज को उपजता है। क्या इसका अर्थ है कि किसान को मेहनत करने कि कोई जरुरत नहीं ? अगर परमेश्वर का राज्य वैसे भी फैलेगा क्या इसका अर्थ है कि मुझे अपना काम नहीं करना है ?
3. जब राइ का पेड़ बड़ा होता है, तो किसको उसका फायदा होता है ? यीशु यहाँ परमेश्वर के राज्य को इससे तुलना कर रहे हैं। अगर मेरे जीवन में परमेश्वर का राज्य बढ़ता है तो क्या औरों को मुझसे फायदा मिलता है ?

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 6

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पड़ने का भागमरकुस 4:1 - 20 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. कितने प्रकार के मिट्टी में बीज गिरते हैं ?
2. बीज क्या को दर्शाता है और मिट्टी क्या को दर्शाता है ?
3. मैं किस प्रकार का मिट्टी हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. पुरे भीड़ को यीशु ने दृष्टांत का अर्थ नहीं समझाया। लेकिन कुछ  लोगों को उसने समझाया। इन लोगों को जिनको यीशु ने अर्थ बताया उन्होंने क्या अलग किया औरों से ? उनके हरकतों से उनके बारे में क्या पता चलता है ?
2. सत्य का अर्थ किसके पास है ? क्या मनुष्य अपने आप अर्थ समझ लेता है ? वचन को पूरी तरह से समझने के लिए मुझे क्या करना होगा ?

मंगलवार, 31 मार्च 2020

मरकुस - दिन 5

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पड़ने का भागमरकुस 3:7 - 35 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु बारह प्रेरितों को क्यों चुने ? प्रथम कारण क्या था और दूसरा क्या था ?
2. यीशु के परिवार के लोगों को जब उसके बारे में सुनने में आया तो वे यीशु के बारे में क्या सोच रहे थे ? (२१वी वचन को देखिये)
3. यीशु के बारे में धर्मशास्त्रियों और यहूदियों क्या कह रहे थे?
4. यीशु किन लोगों को अपने परिवार के रूप में समझते हैं ? (३५वि वचन को देखिये) क्या वह मुझे भी उस तरह अपना भाई या बहन समझेंगे ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. जब बड़ी बड़ी भीड़ यीशु के पीछे जाते थे तो यीशु बारह लोगों को अलग से अपने पास क्यों बुलाये ? इन बारह चेलों से यीशु क्या चाह रहे थे ? क्या में यीशु का उस भीड़ के समान पीछा करता हूँ या क्या वे बारह जैसे यीशु के साथ रहता हूँ ?
2. यह जानते हुए कि यीशु को विरोधियों का सामना करना पड़ा , यीशु को अक्सर परिवार का सहारा नहीं था और उनका खास बारह में से एक ने उनको धोके से पकड़वाया , क्या आप मानते हैं कि यीशु आपके दर्द को समझ सकते हैं ?
3. यीशु के सेवा के कारण रोगी चंगा हो रहे थे और दुष्टात्माएँ लोगों से निकल रहे थे।  इसे देख कर आप यीशु के बारे में क्या समझते हैं ?

सोमवार, 30 मार्च 2020

मरकुस - दिन 4

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पड़ने का भागमरकुस 2:14 - 3:6 

कठिन शब्दों :
1. सब्त / शब्बत : यहुदिओं के लिए शनिवार का दिन एक पवित्र दिन था। परमेश्वर कि आराधना किया जाता है सब्त के दिन। फरीसियों के अनुसार इस नियम के खातिर लोगों को कुछ भी काम नहीं करना चाहिए। सब्त के दिन को स्थापित करने में परमेश्वर का उद्देश्य था कि लोगों को आराम मिले, वे परमेश्वर कि आराधना करने को समय निकाले और ये याद करें कि परमेश्वर कि भलाई ही से वे अपना जीवन जीते हैं। कुल मिलाकर हम समझतें हैं कि मनुष्य कि भलाई के लिए सब्त को बनाया गया था। इस बात को फरीसियों नहीं समझ पाए।
2. कर वसूलने वालों : उन दिनों जब यीशु संसार में थे, कर वसूलने वालों को बड़ा चोर मन जाता था क्योंकि वे जरुरत से ज्यादा कर लोगों से लेते थे और खुद आधा पैसा खा लेते थे। लोगों के अनुसार वे बड़ा पापी थे।
3. मनुष्य का पुत्र : यीशु अपने आप को मनुष्य का पुत्र बुलाते थे।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इस भाग में फरीसियों यीशु से 3 प्रश्न पूछतें हैं। वे सवाल क्या हैं और उनके उत्तर क्या हैं?
2. यीशु के अनुसार उनका इस संसार में आने का क्या मकसद था ? (2:17वे आयत को देखिये)
3. 2 : 17 में फरीसियों के सवाल से आप क्या समझते हैं - फरीसियों अपने आप के बारे में क्या सोचते थे ? यीशु ने जब फरीसियों को देखा तो उसे क्या दिखा ? (३:६ को  देखिये ) मैं अपने बारे में जो सोचता हूँ और यीशु को जो मुझमे दीखता है क्या वे दोनों बराबर होंगे ?
4. यीशु के आने के उद्देश्य को मन में रखते हुए क्या मुझे उसकी आवश्यकता है ? क्या मैं खुद को धर्मी समझता हूँ या एक पापी समझता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. उपवास करने का मकसद क्या है ? यीशु के चेले उपवास क्यों नहीं किये ?
2. 3:4 में वे फरीसियों यीशु का सवाल का जवाब नहीं देते हैं। उसका क्या कारण हो सकता है ?
3. फरीसियों के अनुसार धर्मी होने का अर्थ था कि कुछ भी हो नियमों का पालन करना है। क्या ऐसा सोच सही है?

रविवार, 29 मार्च 2020

मरकुस - दिन 3

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पड़ने का भागमरकुस 1:40 - 2:13 

कठिन शब्दों :
1. कोढ़ रोगी : यहूदी परंपरा के अनुसार एक कोड रोगी को लोगों से अलग होकर रहना था। उसे अशुद्ध मन जाता था और किसी को भी उसे छूने कि इजाज़त नहीं थी। अगर उसका बीमारी ठीक हो गया तो उसे याजक के पास जाकर अपने आप को प्रस्तुत करना था और मूसा / मोशेह द्वारा निर्धारित शुद्धि सम्बन्धी भेंट चढ़ाने के बाद ही लोगों के मध्य में रह सकता था। 
2. यहुदिओं का मानना था कि शारीरिक बीमारी का एक कारण उस व्यक्ति का पाप है। 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. ४०वी आयत में उस कोढ़ रोगी के शब्दों से हमें उसके बारे में क्या पता चलता है ?
2. क्या मुझे यीशु के ताकत और सामर्थ पर उतना निश्चयता है जितना उस कोढ़ के रोगी को था ?
3. उस लकवे के रोगी को यीशु के पास लाने के लिए उसके साथियों को कितना कष्ट उठाना पड़ा? उनके इस कार्य से हमें उनके बारे में क्या पता चलता है ? और उनसे हम क्या सीख सकते हैं ?
4. यीशु को उन लोगों में क्या दिखा (५वी आयत को देखिये )
5. यीशु इस घटना से अपने बारे में क्या सिखाते हैं ? उन शास्त्रियों को वो क्या बोलते हैं ? यीशु को क्या करने का अधिकार है ? (१०वी आयत को देखिये )

और गहरी सोच  के लिए:
1. यीशु उस कोढ़ रोगी को क्यों किसी को कुछ भी बोलने से मना किये ? उस के बात को फैलाने का यीशु कि सेवकाई पर क्या असर पड़ा ?
2. उन शास्त्रियों का रवैया यीशु के प्रति क्या था ? क्या वह सही था ?
3. शास्त्रियों के मन कि बातों को यीशु जान लिए। यह बात जानते हुए कि यीशु लोगों के मन कि बातों को जानता है, आपको कैसा लगता है ? क्या आप अपने मन कि सोच में कुछ बदलाव लाना चाहोगे ?

शनिवार, 28 मार्च 2020

मरकुस - दिन 2

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पड़ने का भागमरकुस 1:16 - 39

कठिन शब्दों :
1. सब्त / शब्बत : यहुदिओं के लिए शनिवार का दिन एक पवित्र दिन था। परमेश्वर कि आराधना किया जाता है सब्त के दिन।
2. आराधनालय / सभागृह : यहुदिओं आराधनालय में प्रभु की आराधना करने को इखट्टा होते थे। वचन को पढ़ा जाता था और शास्त्रिओं आकर शिक्षा देते थे।
3. शास्त्री : लोगों को परमेश्वर का वचन सीखने वाले लोग। परन्तु यीशु के समय कई शास्त्रिओं जिस बात को सिखाते थे अपने खुद के जीवन में अक्सर लागु नहीं करते थे।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु का वचन शमौन और आंद्रेयास के लिए क्या था ?
2. शमौन, आंद्रेयास, यहुन्ना और याकूब को यीशु के पीछे होने से पहले क्या क्या त्यागना पड़ा? मुझे यीशु के पीछे हो लेने के लिए क्या छोड़ना पड़ेगा? क्या मैं उसे छोड़ने तैयार हूँ?
3. यीशु के बारे में दुष्टात्मा जनता था। दुष्टात्मा के अनुसार यीशु कौन है? क्या मैं जनता हूँ यीशु कौन है?
4. यीशु को किन किन बातों के ऊपर अधिकार है?
5. सुबह होते ही यीशु क्या करने को गए ? इससे हम क्या सिख सकते हैं?

और गहरी सोच के लिए:
1. पहला दिन के भाग में हमने यीशु के बारे में दो गवाही को देखा। आज हम एक दुष्टात्मा कि भी गवाही देखते हैं। इससे हमे यीशु के बारे में क्या पता चलता है?
2. 38वी आयत में यीशु प्रचार का सेवा का आरम्भ करते हैं। उसे करने से पहले यीशु क्या करते हैं ? क्या मैं भी कुछ नया कार्य शुरू करने से पहले वही करता हूँ?
3. शमौन के सास के जीवन में प्रभु ने कुछ अच्छा किया। ठीक होते ही शिमोन कि सास क्या करे लगी। जब मेरे जीवन में प्रभु कुछ अच्छा करता है, तब मैं क्या करता हूँ?

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

मरकुस - भूमिका एवं दिन 1

भूमिका

कलीसिया के इतिहास के अनुसार यह पुस्तक मरकुस कहलाने वाले यूहन्ना के द्वारा लिखी गई थी। वह पौलुस और बरनबास के सेवा के यात्राओं में उनका साथ दिया। (प्रेरितों के  काम 12: 23) वह पतरस का भी एक मुख्य सहकर्मी था। (1 पतरस 5: 13) कलीसिया के इतिहास से हमें यह भी मालूम पड़ता है कि इस किताब में लिखी हुई घटनाओँ कि जानकारी मरकुस को पतरस से ही मिला।

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पड़ने का भागमरकुस 1:1-15

कठिन शब्दों :
1. मन फिराव / पश्चाताप: यहूदी परमपरा के अनुसार लोग पश्चाताप या मन फिराव करते वक्त अपने पापों को अंगीकार करते थे, अपने पापों के प्रति दुखित होते थे और पाप को त्याग कर परमेश्वर के ओर लौटने का निर्णय लेते थे।

2. बपतिस्मा का अर्थ डूबना या डुबाना है। यह एक तस्वीर के रूप में पश्चाताप को दर्शाता है, जहाँ कि एक व्यक्ति जब पानी के अंदर जाता है तो अपने पुराने पाप भरी जीवन को लेते जाता है और जब ऊपर आता है तो फिरा हुआ मन के साथ उठता है।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यह समाचार / सन्देश किसके बारे में है?
2. यहूदिया प्रदेश के सारे लोग क्या करते हुए यहुन्ना से बपतिस्मा लिए?
3. यीशु का समाचार के दो भाग हैं - सन्देश और वांछित प्रतिक्रिया। दोनों को ढूंढिए।
4. यीशु के शब्दों और लोगों कि कार्यों को मन में रखते हुए सोचिये कि मेरी क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए?

और गहरी सोच के लिए:
1. यीशु के बारे में दो लोग गवाही देते हैं। वे कौन है और वे यीशु के बारे में क्या कहते हैं?
2. यीशु के अकेलेपन का अनुभव कितने दिन के लिए थे? यीशु के इस अनुभव के बारे में जानते हुए आपको कैसा लगता है? क्या आप अकेलापन कभी महसूस करते हैं?
3. यहुन्ना यीशु के सामने अपने आप को कैसा समझता है? और मैं यीशु के सामने अपने आप को कैसा समझता हूँ?

उद्देश्य एवं दिशा निर्देशों

Hi दोस्तों। 

उम्मीद है कि आप सब स्वस्थ और तंदरुस्त हैं। यह ब्लॉग लिखने का मेरा यह उद्देश्य है कि हम सब मिलकर परमेश्वर के वचन, जो कि बाईबल में लिखा हुआ है उसको पढ़ें और समझें।

बाइबिल वास्तव में एक किताब नहीं बल्कि 66 किताबों का संग्रह है। इन 66 किताबों को एक साथ नहीं परंतु एक एक करके अगर हम पढ़ें तो और अच्छे से समझ सकते हैं। हम पहले मरकुस रचित सुसमाचार को पढ़ेंगे, जो कि नए नियम में दूसरी पुस्तक है। उसके समाप्त होने पर अगले किताब कि ओर जायेंगे और वैसे एक एक कर के पुरे बाइबिल को पढ़ने कि प्रयास करेंगे। 

पढ़ने के कुछ दिशा निर्देश:
1. आपको रोज़ पढ़ने का एक भाग मिलेगा। और समझने और विचार के लिए कुछ सवाल भी मैं आपको दूंगा। 
2. इसे आप अकेले में पढ़ सकते हो या औरों के साथ भी चर्चा करते हुए पढ़ सकते हो। 
3. यदि आप अकेले पढ़ रहे हो तो दो तीन बार पहले भाग को पढ़ लें और फिर सवालों के जवाब को ढूंढें या उन सवालों पर विचार करें। 
4. यदि आप औरों के साथ पढ़ रहे हो तो जोर से पुरे भाग को पहले पढ़ लें। और फिर एक व्यक्ति पहला सवाल पूछेगा और उस सवाल पर सभी चर्चा करेंगे। फिर दूसरा सवाल पूछेगा।  इस प्रकार चर्चा को आगे बढ़ाएं। 
5. सवाल के जवाब को दिए हुए भाग में पहले ढूंढें।  
6. यदि आपको बाइबिल पढ़ने का ज्यादा अनुभव नहीं है या आप के पास ज़्यादा समय नहीं है तो आप गहरी सोच की सवालों को छोड़ दें। 
7. भाग में से कुछ कठिन शब्दों का अर्थ तथा अन्य जानकारी दी जाएगी।  पूरी समझ के लिए उसे भी पढ़ें। 
8. एक भी दिन बिना छूटे रोज़ अगर आप पढ़ेंगे तो इसका ज्यादा आनंद उठा पाओगे। 

उम्मीद है कि आप परमेश्वर कि वचन को पढ़ते हुए उन्नति प्राप्त करोगे। मेरी प्रार्थना है की इस ब्लॉग के माध्यम से आप प्रभु को और जानोगे और उस प्रकार आशीष पाओगे। 

मेरी हिंदी बहुत कमज़ोर है। Google भैया के सहयोग से थोड़ा बहुत कोशिश कर रहा हूँ।  इसलिए गलतियों के लिए माफी मांगता हूँ।  और निवेदन है कि गलतियों को बताएं ताकि मैं आगे जाते हुए खुद को सुधर सकूँ। पढ़ने के लिए धन्यवाद। 

आपकी सेवा में,
यीशु का दास,
केलब 

मरकुस - दिन 28

कैसे पढ़ें? निर्देशों के लिए यहाँ क्लिक करें। पड़ने का भाग :  मरकुस 13 : 1 - 13   कठिन शब्दों : 1.  ढहा दिया जायेगा  : 40 सालों के बाद ईस...