बुधवार, 22 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 25

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पड़ने का भागमरकुस 12 : 1 - 17 

कठिन शब्दों :
1. कैसर : कैसर का अर्थ था महाराजा। रोमी शासन में कैसर ही सबसे मुख्य व्यक्ति था। उन दिनों में इस्राएल के ऊपर रोमी शासन चल रहा था। और वह बहुत कठोर और क्रूर था। लोग रोमीयों को नफरत करते थे मगर वे कुछ नहीं कर पाते क्योंकि अगर वे कर नहीं चूकते तो रोमी उन्हें सजा देते। इसलिए अगर कोई भी इस्राएली खुल के कहे कि कर देना चाहिए उसे गद्दार समझते थे और लोगों का क्रोध उसके ऊपर भड़कता। यहाँ पर यहूदियों यीशु को फसाने का कोशिश करते हैं। अगर यीशु कहते कि देना चाहिए तो लोग उस पर गुस्सा करते मगर अगर यीशु कहते की नहीं देना चाहिए तो हेरोदियों (जो कि राजा के लोग थे) के हाथ यीशु फसते। 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. पहला दृष्टान्त से आप क्या समझते हैं ? मेरे पास जो भी है क्या मैं उन चीज़ों का मालिक हूँ या क्या मुझे ये सरे चीज़ें दी गयी हैं ताकि मैं उनका देखभाल करूँ ?
2. क्या मैं यीशु को फ़साने या परखने का कोशिश करता हूँ या नम्रता के साथ उस्की आज्ञा का पालन और उसकी आराधना करता हूँ ?
3. क्या मैं अपने शासन को वो देता हूँ जो देना चाहिए ? या क्या मैं कर देने से बचने का रास्ता निकालता हूँ ?
4. अगर सिक्के में कैसर का चेहरा अंकित है और उत्पत्ति 1:26   के अनुसार हम परमेश्वर के स्वरूप में बनाये गए हैं तो हमें परमेश्वर को क्या देना है ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. पहला दृष्टान्त को यीशु ने यहूदियों के लिए कहा। वे परमेश्वर के लोग थे और उन्हें परमेश्वर ने अपना वचन और अपनी आज्ञाएं दी थी। मगर यहूदी लोग अपने आप को खास समझने लगे ये भूलते हुए कि उन्हें जो कुछ था वो परमेश्वर कि दया से था। वे परमेश्वर का भी आदर पुरे दिल से नहीं करते थे मगर अपने आप को धार्मिक और प्रभु के खास लोग के समान दिखते थे। दूसरे शब्दों में वे घमंडी हो गए थे।

मगर जब परमेश्वर ने अपने दासों को भेजा उनके मध्य में वे उन्हें मरते थे और परमेश्वर का आदर नहीं करते थे। यीशु परमेश्वर का इकलौता पुत्र है। और जब उसे भी परमेश्वर ने भेजा तो उन लोगों ने उसे मारा।

क्या मेरे जीवन में परमेश्वर ने जो सत्य दिया है उसे मैं नम्रता पूर्वक लोगों से बांटता हूँ या घमंडी हो कर लोगों कि निंदा करता हूँ ?

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