रविवार, 12 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 15

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पड़ने का भागमरकुस 8 : 27 - 38 

कठिन शब्दों :
1.मसीह : यहूदियों का विश्वास था कि एक मसीह आएगा जो परमेश्वर कि ओर से होगा और बड़े बड़े काम करेगा और इस्राएल को बंधन से छुड़ाएगा। परन्तु उनके अनुसार मसीह एक राजा के समान आकर महान व्यक्ति होकर समझते थे। इसलिए जब चेले स्वीकार कर लेते हैं कि यीशु मसीह है तो उनके समझ को सुधरने के लिए यीशु कहते हैं कि उन्हें यातनाएं उठानी होंगी और उन्हें मर दिया जायेगा।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. लोग यीशु के बारे में बहुत कुछ समझ सकते हैं। पर मेरे जीवन में मेरे अनुसार यीशु कौन है ? क्या मैं उसे अच्छे से जानता हूँ ?
2. क्या मैं अपने जीवन में प्रभु के बातों से सरोखर रखता हूँ ? या शैतान के बातों से ? शैतान का रास्ता आसान था। यातनाएं नहीं उठाना, और आराम से जिंदगी जीना। पर क्या मैं परमेश्वर के कामों से सरोखर रखता हालांकि वो ज्यादा कठिन क्यों न हो ?
3. मुझे अगर यीशु का चेला बनना है तो मुझे क्या करना होगा ? क्या मैं यीशु का चेला बनने को तैयार हूँ ?
4. इन वचनों के अनुसार जीवन किस से मिलती है ?
5. क्या मैं परमेश्वर के नाम से लजाता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. मैं सब कुछ खोने को तब तैयार होऊंगा जब मैं समझूंगा कि उसे खोने से भी जो लाभ मिलेगा वो वाकय में उतना ज़्यादा लाभदायक है। क्या मैं अनंत जीवन को, यीशु के साथ संगति को, उसका चेला बनने को उतना लाभदायक समझता हूँ ?
2. सब कुछ त्याग कर क्रूस उठाने का क्या अर्थ है ? क्या मैं अपने जीवन में सब कुछ खोने को तैयार हूँ ? क्या मैं पैसे खोने को तैयार हूँ, क्या दोस्तों को खोने को तैयार हूँ , क्या रिश्तों को खोने को तैयार हूँ , क्या सम्मान, क्या इज्जत , क्या धन सम्पत्ति , क्या अच्छी नौकरी , कपडे मकान , यहाँ तक की जान भी , क्या मैं सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ ? क्या मैं वास्तव में यीशु का चेला बनने को तैयार हूँ ?

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