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पड़ने का भाग: मरकुस 12 : 18 - 34
कठिन शब्दों :
1. सदूकी : यह यहूदियों का एक संप्रदाय था। और सरे सम्प्रदायों में से सबसे आमिर और प्रभावशाली सदूकियों थे। वे केवल पुराने नियम के पहले पांच किताबों को परमेश्वर का वचन मानते थे। और इसलिए वे पुनर्जीवन को नहीं मानते थे। क्योंकि पुनर्जीवन के बारे में अधिक वचन बाकि किताबों में है। परन्तु यीशु यहाँ उन्हें पुराने नियम के पहले किताब, उत्पत्ति , से ही उन्हें जवाब दिया यहाँ तक की वे कुछ उल्टा न बोल पाए।
समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु यहाँ कहते हैं कि पुनर्जीवन है। इसको याद रखते हुए मुझे अपने जीवन को कैसे जीना है ?
2. यीशु ने सदूकियों को कहा कि वे न ही परमेश्वर के वचन को जानते थे और न ही उसके सामर्थ को। क्या मेरे बारे में भी वे वैसा ही कहेंगे ?
3. क्या मैं सच में पुरे मन , जीवन , बुद्धि और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करता हूँ ? ऐसा प्रेम कैसा दिखेगा मेरे रोज़ के जीवन में ?
4. क्या मैं दूसरों को अपने समान प्रेम करता हूँ ?
और गहरी सोच के लिए:
1. हम कई बार परमेश्वर को भजन गाते हैं, आराधना और प्रार्थन करते हैं। पर क्या मैं परमेश्वर को सरे मन के साथ प्रेम करता हूँ ? अगर मैं सांसारिक चीज़ों के लिए 15 साल स्कूल जाता हूँ , और रोज़ दिन में कई घंटे पड़ता हूँ, तो क्या मैं परमेश्वर के वचन को पढ़ने और समझने में काफी समय देता हूँ ?
पड़ने का भाग: मरकुस 12 : 18 - 34
कठिन शब्दों :
1. सदूकी : यह यहूदियों का एक संप्रदाय था। और सरे सम्प्रदायों में से सबसे आमिर और प्रभावशाली सदूकियों थे। वे केवल पुराने नियम के पहले पांच किताबों को परमेश्वर का वचन मानते थे। और इसलिए वे पुनर्जीवन को नहीं मानते थे। क्योंकि पुनर्जीवन के बारे में अधिक वचन बाकि किताबों में है। परन्तु यीशु यहाँ उन्हें पुराने नियम के पहले किताब, उत्पत्ति , से ही उन्हें जवाब दिया यहाँ तक की वे कुछ उल्टा न बोल पाए।
समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु यहाँ कहते हैं कि पुनर्जीवन है। इसको याद रखते हुए मुझे अपने जीवन को कैसे जीना है ?
2. यीशु ने सदूकियों को कहा कि वे न ही परमेश्वर के वचन को जानते थे और न ही उसके सामर्थ को। क्या मेरे बारे में भी वे वैसा ही कहेंगे ?
3. क्या मैं सच में पुरे मन , जीवन , बुद्धि और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करता हूँ ? ऐसा प्रेम कैसा दिखेगा मेरे रोज़ के जीवन में ?
4. क्या मैं दूसरों को अपने समान प्रेम करता हूँ ?
और गहरी सोच के लिए:
1. हम कई बार परमेश्वर को भजन गाते हैं, आराधना और प्रार्थन करते हैं। पर क्या मैं परमेश्वर को सरे मन के साथ प्रेम करता हूँ ? अगर मैं सांसारिक चीज़ों के लिए 15 साल स्कूल जाता हूँ , और रोज़ दिन में कई घंटे पड़ता हूँ, तो क्या मैं परमेश्वर के वचन को पढ़ने और समझने में काफी समय देता हूँ ?
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