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पड़ने का भाग: मरकुस 11 : 12 - 19
कठिन शब्दों :
1. मन्दिर में : यह मंदिर का बहरी आंगन था। अगर गैर यहूदियों परमेश्वर कि आराधना करना चाहते थे, तो वे लोग यहाँ पर परमेश्वर कि आराधना करने आ सकते थे। परन्तु उन समयों में यहूदियों गैर यहूदियों को मंदिर आने से मन करते हुए, वहां पर अपना धंधा चलने लगे। जो भी लोग आराधना के लिए आते थे उन्हें कई बार कुछ जानवर या चिड़िया लेन कि जरुरत थी बलि के लिए। इसलिए बलि के लिए जानवरों और चिड़ियों को बेचने का धंधा चल रहा था।
समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. अंजीर का पेड़ में सिर्फ फल होने की ऋतू में ही पत्ते निकल आते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो अगर पत्ते दिखे तो उसका मतलब है कि फल भी होना चाहिए। क्या मेरे जीवन में भी फल का दिखावा है मगर फल नहीं ? (मतलब मैं कई चीज़ें करता हूँ जो लोग को दिखे कि मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ लेकिन मेरे मन में बुरी चीज़ें हैं)?
2. जहाँ पर आराधना हो रहा था वहां पर लोग अपने ही भलाई के लिए धंधा चला रहे थे। क्या मेरे जीवन में भी जहाँ आराधना होना चाहिए वो नहीं हो रहा है मगर अपना ही बढ़ाई हो रहा है ?
3. जब यीशु मेरे गलितयों को सुधारता है , तो क्या मैं याजकों के समान उस पर गुस्सा करता हूँ या क्या मैं अपना गलती स्वीकार करके अपने आप को सुधरने का प्रयास करता हूँ ?
और गहरी सोच के लिए:
1. मंदिर में रोज़ बलि चढ़ाई जा रही थी मगर किसा का भी मन प्रभु कि ओर नहीं था , वैसे ही जैसे अंजीर के पेड़ में पत्ते थे मगर फल नहीं। हो सकता मेरे जीवन में भी प्रार्थना हो और कई धार्मिक चीज़ें हो, पर हो सकता है की प्रभु मेरे जीवन में न हो।
पड़ने का भाग: मरकुस 11 : 12 - 19
कठिन शब्दों :
1. मन्दिर में : यह मंदिर का बहरी आंगन था। अगर गैर यहूदियों परमेश्वर कि आराधना करना चाहते थे, तो वे लोग यहाँ पर परमेश्वर कि आराधना करने आ सकते थे। परन्तु उन समयों में यहूदियों गैर यहूदियों को मंदिर आने से मन करते हुए, वहां पर अपना धंधा चलने लगे। जो भी लोग आराधना के लिए आते थे उन्हें कई बार कुछ जानवर या चिड़िया लेन कि जरुरत थी बलि के लिए। इसलिए बलि के लिए जानवरों और चिड़ियों को बेचने का धंधा चल रहा था।
समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. अंजीर का पेड़ में सिर्फ फल होने की ऋतू में ही पत्ते निकल आते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो अगर पत्ते दिखे तो उसका मतलब है कि फल भी होना चाहिए। क्या मेरे जीवन में भी फल का दिखावा है मगर फल नहीं ? (मतलब मैं कई चीज़ें करता हूँ जो लोग को दिखे कि मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ लेकिन मेरे मन में बुरी चीज़ें हैं)?
2. जहाँ पर आराधना हो रहा था वहां पर लोग अपने ही भलाई के लिए धंधा चला रहे थे। क्या मेरे जीवन में भी जहाँ आराधना होना चाहिए वो नहीं हो रहा है मगर अपना ही बढ़ाई हो रहा है ?
3. जब यीशु मेरे गलितयों को सुधारता है , तो क्या मैं याजकों के समान उस पर गुस्सा करता हूँ या क्या मैं अपना गलती स्वीकार करके अपने आप को सुधरने का प्रयास करता हूँ ?
और गहरी सोच के लिए:
1. मंदिर में रोज़ बलि चढ़ाई जा रही थी मगर किसा का भी मन प्रभु कि ओर नहीं था , वैसे ही जैसे अंजीर के पेड़ में पत्ते थे मगर फल नहीं। हो सकता मेरे जीवन में भी प्रार्थना हो और कई धार्मिक चीज़ें हो, पर हो सकता है की प्रभु मेरे जीवन में न हो।
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