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पड़ने का भाग: मरकुस 9 : 1 - 13
कठिन शब्दों :
1.एलिय्याह और मूसा: मूसा और एलिय्याह पुराने नियम के दो महत्वपूर्ण भविष्यद्वक्ता थे। पुराने नियम में परमेश्वर के भविष्यवाणी द्वारा कहा गया था कि मसीह के आने से पहले एलिय्याह आएगा। परन्तु उसे समझने का अर्थ है कि एलिय्याह के आत्मा में एक व्यक्ति आएगा। और 13वे वचन में जब यीशु कहते हैं कि एलिय्याह आ चूका है वे बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना कि बात कर रहे हैं।
समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इस भाग में दिए हुए दर्शन से हमें यीशु के बारे में क्या पता चलता है ? यीशु कौन है ? स्वर्ग से जो वाणी आयी , वो किसकी वाणी थी ?
2. इस भाग में हम यीशु के बारे में कुछ सीखते हैं। अगर यीशु वाकय में वही है, तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। उस वाणी ने चेलों को क्या कहा ?
3. क्या मैं अपने रोज़ के जीवन में यीशु की महिमा को स्मरण करता हूँ ? और क्या मैं यीशु की सुनता हूँ ?
और गहरी सोच के लिए:
1. पुरे मरकुस के किताब में हमने कितने बार यीशु के बारे गवाही सुना है ? यीशु कौन है ? अगर मैं इस सवाल का जवाब जानूंगा तो और उसे अपने जीवन में महसूस करूँगा तो क्या मेरा जीवन का चल बिलकुल अलग नहीं होगा ?
2. यूहन्ना , जिसके बारे में यीशु बात कर रहे हैं १२वे वचन में, उसे मार दिया गया था। यीशु जानते थे कि उन्हें भी कई यातनाएं साहनी पड़ेगी। उसे जानते हुए भी यीशु अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे। हमने कुछ दिन पहले देखा कि यीशु का चला बनना है तो अपना क्रूस उठा के उसके पीछे हो लेना है। यह बात जानते हुए कि मुझे भी अपने जीवन में कष्ट उठाना है , क्या मैं यीशु के समान निडर होकर आगे बढ़ सकता हूँ ?
पड़ने का भाग: मरकुस 9 : 1 - 13
कठिन शब्दों :
1.एलिय्याह और मूसा: मूसा और एलिय्याह पुराने नियम के दो महत्वपूर्ण भविष्यद्वक्ता थे। पुराने नियम में परमेश्वर के भविष्यवाणी द्वारा कहा गया था कि मसीह के आने से पहले एलिय्याह आएगा। परन्तु उसे समझने का अर्थ है कि एलिय्याह के आत्मा में एक व्यक्ति आएगा। और 13वे वचन में जब यीशु कहते हैं कि एलिय्याह आ चूका है वे बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना कि बात कर रहे हैं।
समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इस भाग में दिए हुए दर्शन से हमें यीशु के बारे में क्या पता चलता है ? यीशु कौन है ? स्वर्ग से जो वाणी आयी , वो किसकी वाणी थी ?
2. इस भाग में हम यीशु के बारे में कुछ सीखते हैं। अगर यीशु वाकय में वही है, तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। उस वाणी ने चेलों को क्या कहा ?
3. क्या मैं अपने रोज़ के जीवन में यीशु की महिमा को स्मरण करता हूँ ? और क्या मैं यीशु की सुनता हूँ ?
और गहरी सोच के लिए:
1. पुरे मरकुस के किताब में हमने कितने बार यीशु के बारे गवाही सुना है ? यीशु कौन है ? अगर मैं इस सवाल का जवाब जानूंगा तो और उसे अपने जीवन में महसूस करूँगा तो क्या मेरा जीवन का चल बिलकुल अलग नहीं होगा ?
2. यूहन्ना , जिसके बारे में यीशु बात कर रहे हैं १२वे वचन में, उसे मार दिया गया था। यीशु जानते थे कि उन्हें भी कई यातनाएं साहनी पड़ेगी। उसे जानते हुए भी यीशु अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे। हमने कुछ दिन पहले देखा कि यीशु का चला बनना है तो अपना क्रूस उठा के उसके पीछे हो लेना है। यह बात जानते हुए कि मुझे भी अपने जीवन में कष्ट उठाना है , क्या मैं यीशु के समान निडर होकर आगे बढ़ सकता हूँ ?
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