मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 17

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पड़ने का भागमरकुस 9 : 14 - 29 


समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इतने सालों से अपने बेटे कि हालत को देखते हुए उस पिता का अनुभव कैसा रहा होगा ? कल्पना कर के देखिये।
2. जब यीशु ने उस पिता के अविश्वास को दिखाया तो उस पिता का प्रतिक्रिया क्या था ? क्या मैं भी उसके जैसे प्रार्थना कर सकता हूँ ?
3. जब कुछ समस्या का हल ही नहीं आ रहा हो, तो क्या मैं प्रार्थना करता हूँ या निराश हो जाता हूँ ?

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 16

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पड़ने का भागमरकुस 9 : 1 - 13 

कठिन शब्दों :
1.एलिय्याह और मूसा: मूसा और एलिय्याह पुराने नियम के दो महत्वपूर्ण भविष्यद्वक्ता थे। पुराने नियम में परमेश्वर के भविष्यवाणी द्वारा कहा गया था कि मसीह के आने से पहले एलिय्याह आएगा। परन्तु उसे समझने का अर्थ है कि एलिय्याह के आत्मा में एक व्यक्ति आएगा। और 13वे वचन में जब यीशु कहते हैं कि एलिय्याह आ चूका है वे बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना कि बात कर रहे हैं।


समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इस भाग में दिए हुए दर्शन से हमें यीशु के बारे में क्या पता चलता है ? यीशु कौन है ? स्वर्ग से जो वाणी आयी , वो किसकी वाणी थी ?
2. इस भाग में हम यीशु के बारे में कुछ सीखते हैं। अगर यीशु वाकय में वही है, तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। उस वाणी ने चेलों को क्या कहा ?
3. क्या मैं अपने रोज़ के जीवन में यीशु की महिमा को स्मरण करता हूँ ? और क्या मैं यीशु की सुनता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. पुरे मरकुस के किताब में हमने कितने बार यीशु के बारे गवाही सुना है ? यीशु कौन है ? अगर मैं इस सवाल का जवाब जानूंगा तो और उसे अपने जीवन में महसूस करूँगा तो क्या मेरा जीवन का चल बिलकुल अलग नहीं  होगा ?
2. यूहन्ना , जिसके बारे में यीशु बात कर रहे हैं १२वे वचन में, उसे मार दिया गया था। यीशु जानते थे कि उन्हें भी कई यातनाएं साहनी पड़ेगी। उसे जानते हुए भी यीशु अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे। हमने कुछ दिन पहले देखा कि यीशु का चला बनना है तो अपना क्रूस उठा के उसके पीछे हो लेना है। यह बात जानते हुए कि मुझे भी अपने जीवन में कष्ट उठाना है , क्या मैं यीशु के समान निडर होकर आगे बढ़ सकता हूँ ?

रविवार, 12 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 15

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पड़ने का भागमरकुस 8 : 27 - 38 

कठिन शब्दों :
1.मसीह : यहूदियों का विश्वास था कि एक मसीह आएगा जो परमेश्वर कि ओर से होगा और बड़े बड़े काम करेगा और इस्राएल को बंधन से छुड़ाएगा। परन्तु उनके अनुसार मसीह एक राजा के समान आकर महान व्यक्ति होकर समझते थे। इसलिए जब चेले स्वीकार कर लेते हैं कि यीशु मसीह है तो उनके समझ को सुधरने के लिए यीशु कहते हैं कि उन्हें यातनाएं उठानी होंगी और उन्हें मर दिया जायेगा।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. लोग यीशु के बारे में बहुत कुछ समझ सकते हैं। पर मेरे जीवन में मेरे अनुसार यीशु कौन है ? क्या मैं उसे अच्छे से जानता हूँ ?
2. क्या मैं अपने जीवन में प्रभु के बातों से सरोखर रखता हूँ ? या शैतान के बातों से ? शैतान का रास्ता आसान था। यातनाएं नहीं उठाना, और आराम से जिंदगी जीना। पर क्या मैं परमेश्वर के कामों से सरोखर रखता हालांकि वो ज्यादा कठिन क्यों न हो ?
3. मुझे अगर यीशु का चेला बनना है तो मुझे क्या करना होगा ? क्या मैं यीशु का चेला बनने को तैयार हूँ ?
4. इन वचनों के अनुसार जीवन किस से मिलती है ?
5. क्या मैं परमेश्वर के नाम से लजाता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. मैं सब कुछ खोने को तब तैयार होऊंगा जब मैं समझूंगा कि उसे खोने से भी जो लाभ मिलेगा वो वाकय में उतना ज़्यादा लाभदायक है। क्या मैं अनंत जीवन को, यीशु के साथ संगति को, उसका चेला बनने को उतना लाभदायक समझता हूँ ?
2. सब कुछ त्याग कर क्रूस उठाने का क्या अर्थ है ? क्या मैं अपने जीवन में सब कुछ खोने को तैयार हूँ ? क्या मैं पैसे खोने को तैयार हूँ, क्या दोस्तों को खोने को तैयार हूँ , क्या रिश्तों को खोने को तैयार हूँ , क्या सम्मान, क्या इज्जत , क्या धन सम्पत्ति , क्या अच्छी नौकरी , कपडे मकान , यहाँ तक की जान भी , क्या मैं सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ ? क्या मैं वास्तव में यीशु का चेला बनने को तैयार हूँ ?

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 14

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पड़ने का भागमरकुस 8 : 14 - 26 

कठिन शब्दों :
1. हेरोदेस : हेरोदेस वहां का राजा था।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. क्या उस अंधे की ऑंखें एक ही बार में  पूरी रीती से खुल गयीं ? क्या एक ही बार में मेरे प्रार्थनाओं का जवाब हमेशा मिलेगा ?
2. २१वि वचन में यीशु किस चीज़ को समझने कि बात कर रहे हैं ? अगर चेलों को याद रहता यीशु ने कितनों को कितना कम रोटी से खिलाया तो क्या वे रोटी या खाने को लेकर चिंता करते ?
3. यीशु चेलों से पूछते हैं अगर उनको याद है यीशु ने क्या किया। क्या यीशु के भलाई जो मेरे जीवन में हुआ है क्या मैं उसे याद रखता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. जैसे उस अंधे कि ऑंखें धीरे धीरे खुली वैसे ही मेरी आत्मिक ऑंखें भी धीरे धीरे खुल सकते हैं। चेलों को यीशु के बारे में समझने में समय हुआ। तो क्या मुझे निराश होना है अगर विश्वास में पूरी तरह से तुरंत बढ़ न जाऊं ?

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 13

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पड़ने का भागमरकुस 8 : 1 - 13 

कठिन शब्दों :
1. आश्चर्य चिन्ह : यहूदी लोग का विश्वास था कि जब मसीह आएगा तो वह जितना बड़ा आश्चर्यकर्म मूसा ने किया उससे भी बड़े बड़े काम करेगा। मूसा ने पुरे इस्राएली लोगों को 40 सालों के लिए खिलाया, हलाकि उसने नहीं परन्तु परमेश्वर ने मूसा के द्वारा। फरीसि लोग यीशु से चिन्ह इसलिए मांग रहे थे या दूसरे शब्दों में वे यीशु को अपने आप को मसीह साबित करने को कह रहे थे जो एक बहाना था क्योंकि वे विश्वास करने को तैयार ही नहीं थे। उनके अनुसार 400 लोगों को एक बार खिलाना छोटी बात थी अगर मूसा के कामों से तुलना किया जाये तो।
2. चार हज़ार पुरुष : इसरायली परंपरा के अनुसार महिलाओं और बच्चों को नहीं गिना जाता था तो कुल संख्या और बहुत ज्यादा हुआ होगा।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु को भीड़ को देखकर क्या भावना महसूस हुआ ?
2. जब चेलों ने कहा कि इतनों के लिए खाना खिलाना मुश्किल होगा तब यीशु ने क्या सवाल पूछा ? अगर मुझे लगता है कि इतना बड़ा चीज़ करना मुश्किल है मुझे पूछना है मेरे पास यही क्या है। जब चेले जो उनके पास था उसको देने को तैयार हुए तब यीशु ने उसे आशीषित करके लोगों को खिलाया। क्या मैं मेरा पास जितना है भले कम क्यों न हो, क्या मैं उसे देने को तैयार हूँ लोगों के लिए ?
3. क्या मुझे यीशु के सामर्थ्य पे कभी शक करना है ?

और गहरी सोच  के लिए:
1.यीशु सिर्फ लोगों के आत्मिक जीवन पर ही चिंतित नहीं था परन्तु उनकी शारीरिक जरूरतों को भी संभालता था।  क्या मैं लोगों के प्रति ऐसी मनसा रखता हूँ ?

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 13

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पड़ने का भागमरकुस 7 : 24 - 37 

कठिन शब्दों :
1. यूनानी : यहूदी लोग यूनानी को नीच समझते थे। उनके अनुसार जो भी व्यक्ति यहूदी नहीं था, वह प्रभु के आशीष के हक़दार नहीं था। वे उन्हें कुत्ते की तरह समझते थे। पर वे गलत थे। उस स्त्री कि बेटी को ठीक करते हुए यीशु यहाँ दिखा रहे  हैं कि यहूदी हो या यूनानी यीशु सब के लिए है।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. उस स्त्री को लगा कि गिरे हुए चुरचार समान थोड़ा सा आशीष भी काफी था उसकी बेटी के ठीक होने के लिए। क्या मुझमे इतना विश्वास है ?
2. उसे कुत्ते से तुलना जब किया गया, तब उस स्त्री ने कुछ नहीं किया परन्तु स्वीकार कर लिया। क्या मैं उतना नम्र हूँ कि यीशु के सामने झुक के जाऊं ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. क्या मैं यीशु के कार्यों को देख कर आश्चर्य से भर जाता हूँ और क्या मैं उसकी आराधना करते रहता हूँ ?

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

मरकुस - दिन 12

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पड़ने का भागमरकुस 7 : 1 - 23 

कठिन शब्दों :
1. पुरखों की रीति / परंपरा : बाबुल कि निर्वासन के बाद , यहूदी धर्मशास्त्रियाँ लोगों के लिए बहुत सरे नियम बनाये। परमेश्वर के नियमों को रोज़ के व्यावहारिक जीवन में कैसे लागु किया जाये - इस बात को समझने के लिए उन्होंने अपने समझ से कई परम्पराएं और रीती रिवाज बनाये। ये नियमों को शुरुआत में लाये जाने के इरादे गलत नहीं थे। परन्तु ये परमेश्वर का वचन नहीं था और कहीं कहीं फरीसी लोग इन परम्पराओं को परमेश्वर के वचन से और अधिक मुख्यता देने लगे। वो बात गलत था।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. आपके अनुसार क्या कुछ भी खाने से लोग अशुद्ध हो सकते हैं ? यीशु के अनुसार लोग अशुद्ध किस चीज़ से होते हैं ?
2. क्या हमारे जीवन में हम कभी कभी रीती रिवाज़ों को ज्यादा ध्यान देते हुए प्रभु को भूल जाते हैं ? हमें परमेश्वर का वचन को पढ़ते हुए सही रीती से समझ कर ही कुछ भी चीज़ करना है।

और गहरी सोच  के लिए:
1. पुराने धर्मशास्त्रियों जिन्होंने पहले इन नियमों को बनाया उनका इरादा सही था। मगर वे परमेश्वर के ववचन को सच्ची रीती से नहीं समझ पाए। तो परमेश्वर का वचन को सावधानी के साथ समझने का प्रयास करना है और लोगों से भी जांचना है की हमारी समझ सही है या नहीं। 

मरकुस - दिन 28

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