मंगलवार, 31 मार्च 2020

मरकुस - दिन 5

कैसे पढ़ें? निर्देशों के लिए यहाँ क्लिक करें।

पड़ने का भागमरकुस 3:7 - 35 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु बारह प्रेरितों को क्यों चुने ? प्रथम कारण क्या था और दूसरा क्या था ?
2. यीशु के परिवार के लोगों को जब उसके बारे में सुनने में आया तो वे यीशु के बारे में क्या सोच रहे थे ? (२१वी वचन को देखिये)
3. यीशु के बारे में धर्मशास्त्रियों और यहूदियों क्या कह रहे थे?
4. यीशु किन लोगों को अपने परिवार के रूप में समझते हैं ? (३५वि वचन को देखिये) क्या वह मुझे भी उस तरह अपना भाई या बहन समझेंगे ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. जब बड़ी बड़ी भीड़ यीशु के पीछे जाते थे तो यीशु बारह लोगों को अलग से अपने पास क्यों बुलाये ? इन बारह चेलों से यीशु क्या चाह रहे थे ? क्या में यीशु का उस भीड़ के समान पीछा करता हूँ या क्या वे बारह जैसे यीशु के साथ रहता हूँ ?
2. यह जानते हुए कि यीशु को विरोधियों का सामना करना पड़ा , यीशु को अक्सर परिवार का सहारा नहीं था और उनका खास बारह में से एक ने उनको धोके से पकड़वाया , क्या आप मानते हैं कि यीशु आपके दर्द को समझ सकते हैं ?
3. यीशु के सेवा के कारण रोगी चंगा हो रहे थे और दुष्टात्माएँ लोगों से निकल रहे थे।  इसे देख कर आप यीशु के बारे में क्या समझते हैं ?

सोमवार, 30 मार्च 2020

मरकुस - दिन 4

कैसे पढ़ें? निर्देशों के लिए यहाँ क्लिक करें।

पड़ने का भागमरकुस 2:14 - 3:6 

कठिन शब्दों :
1. सब्त / शब्बत : यहुदिओं के लिए शनिवार का दिन एक पवित्र दिन था। परमेश्वर कि आराधना किया जाता है सब्त के दिन। फरीसियों के अनुसार इस नियम के खातिर लोगों को कुछ भी काम नहीं करना चाहिए। सब्त के दिन को स्थापित करने में परमेश्वर का उद्देश्य था कि लोगों को आराम मिले, वे परमेश्वर कि आराधना करने को समय निकाले और ये याद करें कि परमेश्वर कि भलाई ही से वे अपना जीवन जीते हैं। कुल मिलाकर हम समझतें हैं कि मनुष्य कि भलाई के लिए सब्त को बनाया गया था। इस बात को फरीसियों नहीं समझ पाए।
2. कर वसूलने वालों : उन दिनों जब यीशु संसार में थे, कर वसूलने वालों को बड़ा चोर मन जाता था क्योंकि वे जरुरत से ज्यादा कर लोगों से लेते थे और खुद आधा पैसा खा लेते थे। लोगों के अनुसार वे बड़ा पापी थे।
3. मनुष्य का पुत्र : यीशु अपने आप को मनुष्य का पुत्र बुलाते थे।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. इस भाग में फरीसियों यीशु से 3 प्रश्न पूछतें हैं। वे सवाल क्या हैं और उनके उत्तर क्या हैं?
2. यीशु के अनुसार उनका इस संसार में आने का क्या मकसद था ? (2:17वे आयत को देखिये)
3. 2 : 17 में फरीसियों के सवाल से आप क्या समझते हैं - फरीसियों अपने आप के बारे में क्या सोचते थे ? यीशु ने जब फरीसियों को देखा तो उसे क्या दिखा ? (३:६ को  देखिये ) मैं अपने बारे में जो सोचता हूँ और यीशु को जो मुझमे दीखता है क्या वे दोनों बराबर होंगे ?
4. यीशु के आने के उद्देश्य को मन में रखते हुए क्या मुझे उसकी आवश्यकता है ? क्या मैं खुद को धर्मी समझता हूँ या एक पापी समझता हूँ ?

और गहरी सोच  के लिए:
1. उपवास करने का मकसद क्या है ? यीशु के चेले उपवास क्यों नहीं किये ?
2. 3:4 में वे फरीसियों यीशु का सवाल का जवाब नहीं देते हैं। उसका क्या कारण हो सकता है ?
3. फरीसियों के अनुसार धर्मी होने का अर्थ था कि कुछ भी हो नियमों का पालन करना है। क्या ऐसा सोच सही है?

रविवार, 29 मार्च 2020

मरकुस - दिन 3

कैसे पढ़ें? निर्देशों के लिए यहाँ क्लिक करें।

पड़ने का भागमरकुस 1:40 - 2:13 

कठिन शब्दों :
1. कोढ़ रोगी : यहूदी परंपरा के अनुसार एक कोड रोगी को लोगों से अलग होकर रहना था। उसे अशुद्ध मन जाता था और किसी को भी उसे छूने कि इजाज़त नहीं थी। अगर उसका बीमारी ठीक हो गया तो उसे याजक के पास जाकर अपने आप को प्रस्तुत करना था और मूसा / मोशेह द्वारा निर्धारित शुद्धि सम्बन्धी भेंट चढ़ाने के बाद ही लोगों के मध्य में रह सकता था। 
2. यहुदिओं का मानना था कि शारीरिक बीमारी का एक कारण उस व्यक्ति का पाप है। 

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. ४०वी आयत में उस कोढ़ रोगी के शब्दों से हमें उसके बारे में क्या पता चलता है ?
2. क्या मुझे यीशु के ताकत और सामर्थ पर उतना निश्चयता है जितना उस कोढ़ के रोगी को था ?
3. उस लकवे के रोगी को यीशु के पास लाने के लिए उसके साथियों को कितना कष्ट उठाना पड़ा? उनके इस कार्य से हमें उनके बारे में क्या पता चलता है ? और उनसे हम क्या सीख सकते हैं ?
4. यीशु को उन लोगों में क्या दिखा (५वी आयत को देखिये )
5. यीशु इस घटना से अपने बारे में क्या सिखाते हैं ? उन शास्त्रियों को वो क्या बोलते हैं ? यीशु को क्या करने का अधिकार है ? (१०वी आयत को देखिये )

और गहरी सोच  के लिए:
1. यीशु उस कोढ़ रोगी को क्यों किसी को कुछ भी बोलने से मना किये ? उस के बात को फैलाने का यीशु कि सेवकाई पर क्या असर पड़ा ?
2. उन शास्त्रियों का रवैया यीशु के प्रति क्या था ? क्या वह सही था ?
3. शास्त्रियों के मन कि बातों को यीशु जान लिए। यह बात जानते हुए कि यीशु लोगों के मन कि बातों को जानता है, आपको कैसा लगता है ? क्या आप अपने मन कि सोच में कुछ बदलाव लाना चाहोगे ?

शनिवार, 28 मार्च 2020

मरकुस - दिन 2

कैसे पढ़ें? निर्देशों के लिए यहाँ क्लिक करें।

पड़ने का भागमरकुस 1:16 - 39

कठिन शब्दों :
1. सब्त / शब्बत : यहुदिओं के लिए शनिवार का दिन एक पवित्र दिन था। परमेश्वर कि आराधना किया जाता है सब्त के दिन।
2. आराधनालय / सभागृह : यहुदिओं आराधनालय में प्रभु की आराधना करने को इखट्टा होते थे। वचन को पढ़ा जाता था और शास्त्रिओं आकर शिक्षा देते थे।
3. शास्त्री : लोगों को परमेश्वर का वचन सीखने वाले लोग। परन्तु यीशु के समय कई शास्त्रिओं जिस बात को सिखाते थे अपने खुद के जीवन में अक्सर लागु नहीं करते थे।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यीशु का वचन शमौन और आंद्रेयास के लिए क्या था ?
2. शमौन, आंद्रेयास, यहुन्ना और याकूब को यीशु के पीछे होने से पहले क्या क्या त्यागना पड़ा? मुझे यीशु के पीछे हो लेने के लिए क्या छोड़ना पड़ेगा? क्या मैं उसे छोड़ने तैयार हूँ?
3. यीशु के बारे में दुष्टात्मा जनता था। दुष्टात्मा के अनुसार यीशु कौन है? क्या मैं जनता हूँ यीशु कौन है?
4. यीशु को किन किन बातों के ऊपर अधिकार है?
5. सुबह होते ही यीशु क्या करने को गए ? इससे हम क्या सिख सकते हैं?

और गहरी सोच के लिए:
1. पहला दिन के भाग में हमने यीशु के बारे में दो गवाही को देखा। आज हम एक दुष्टात्मा कि भी गवाही देखते हैं। इससे हमे यीशु के बारे में क्या पता चलता है?
2. 38वी आयत में यीशु प्रचार का सेवा का आरम्भ करते हैं। उसे करने से पहले यीशु क्या करते हैं ? क्या मैं भी कुछ नया कार्य शुरू करने से पहले वही करता हूँ?
3. शमौन के सास के जीवन में प्रभु ने कुछ अच्छा किया। ठीक होते ही शिमोन कि सास क्या करे लगी। जब मेरे जीवन में प्रभु कुछ अच्छा करता है, तब मैं क्या करता हूँ?

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

मरकुस - भूमिका एवं दिन 1

भूमिका

कलीसिया के इतिहास के अनुसार यह पुस्तक मरकुस कहलाने वाले यूहन्ना के द्वारा लिखी गई थी। वह पौलुस और बरनबास के सेवा के यात्राओं में उनका साथ दिया। (प्रेरितों के  काम 12: 23) वह पतरस का भी एक मुख्य सहकर्मी था। (1 पतरस 5: 13) कलीसिया के इतिहास से हमें यह भी मालूम पड़ता है कि इस किताब में लिखी हुई घटनाओँ कि जानकारी मरकुस को पतरस से ही मिला।

कैसे पढ़ें? निर्देशों के लिए यहाँ क्लिक करें।

पड़ने का भागमरकुस 1:1-15

कठिन शब्दों :
1. मन फिराव / पश्चाताप: यहूदी परमपरा के अनुसार लोग पश्चाताप या मन फिराव करते वक्त अपने पापों को अंगीकार करते थे, अपने पापों के प्रति दुखित होते थे और पाप को त्याग कर परमेश्वर के ओर लौटने का निर्णय लेते थे।

2. बपतिस्मा का अर्थ डूबना या डुबाना है। यह एक तस्वीर के रूप में पश्चाताप को दर्शाता है, जहाँ कि एक व्यक्ति जब पानी के अंदर जाता है तो अपने पुराने पाप भरी जीवन को लेते जाता है और जब ऊपर आता है तो फिरा हुआ मन के साथ उठता है।

समझने और विचार करने के लिए प्रश्न:
1. यह समाचार / सन्देश किसके बारे में है?
2. यहूदिया प्रदेश के सारे लोग क्या करते हुए यहुन्ना से बपतिस्मा लिए?
3. यीशु का समाचार के दो भाग हैं - सन्देश और वांछित प्रतिक्रिया। दोनों को ढूंढिए।
4. यीशु के शब्दों और लोगों कि कार्यों को मन में रखते हुए सोचिये कि मेरी क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए?

और गहरी सोच के लिए:
1. यीशु के बारे में दो लोग गवाही देते हैं। वे कौन है और वे यीशु के बारे में क्या कहते हैं?
2. यीशु के अकेलेपन का अनुभव कितने दिन के लिए थे? यीशु के इस अनुभव के बारे में जानते हुए आपको कैसा लगता है? क्या आप अकेलापन कभी महसूस करते हैं?
3. यहुन्ना यीशु के सामने अपने आप को कैसा समझता है? और मैं यीशु के सामने अपने आप को कैसा समझता हूँ?

उद्देश्य एवं दिशा निर्देशों

Hi दोस्तों। 

उम्मीद है कि आप सब स्वस्थ और तंदरुस्त हैं। यह ब्लॉग लिखने का मेरा यह उद्देश्य है कि हम सब मिलकर परमेश्वर के वचन, जो कि बाईबल में लिखा हुआ है उसको पढ़ें और समझें।

बाइबिल वास्तव में एक किताब नहीं बल्कि 66 किताबों का संग्रह है। इन 66 किताबों को एक साथ नहीं परंतु एक एक करके अगर हम पढ़ें तो और अच्छे से समझ सकते हैं। हम पहले मरकुस रचित सुसमाचार को पढ़ेंगे, जो कि नए नियम में दूसरी पुस्तक है। उसके समाप्त होने पर अगले किताब कि ओर जायेंगे और वैसे एक एक कर के पुरे बाइबिल को पढ़ने कि प्रयास करेंगे। 

पढ़ने के कुछ दिशा निर्देश:
1. आपको रोज़ पढ़ने का एक भाग मिलेगा। और समझने और विचार के लिए कुछ सवाल भी मैं आपको दूंगा। 
2. इसे आप अकेले में पढ़ सकते हो या औरों के साथ भी चर्चा करते हुए पढ़ सकते हो। 
3. यदि आप अकेले पढ़ रहे हो तो दो तीन बार पहले भाग को पढ़ लें और फिर सवालों के जवाब को ढूंढें या उन सवालों पर विचार करें। 
4. यदि आप औरों के साथ पढ़ रहे हो तो जोर से पुरे भाग को पहले पढ़ लें। और फिर एक व्यक्ति पहला सवाल पूछेगा और उस सवाल पर सभी चर्चा करेंगे। फिर दूसरा सवाल पूछेगा।  इस प्रकार चर्चा को आगे बढ़ाएं। 
5. सवाल के जवाब को दिए हुए भाग में पहले ढूंढें।  
6. यदि आपको बाइबिल पढ़ने का ज्यादा अनुभव नहीं है या आप के पास ज़्यादा समय नहीं है तो आप गहरी सोच की सवालों को छोड़ दें। 
7. भाग में से कुछ कठिन शब्दों का अर्थ तथा अन्य जानकारी दी जाएगी।  पूरी समझ के लिए उसे भी पढ़ें। 
8. एक भी दिन बिना छूटे रोज़ अगर आप पढ़ेंगे तो इसका ज्यादा आनंद उठा पाओगे। 

उम्मीद है कि आप परमेश्वर कि वचन को पढ़ते हुए उन्नति प्राप्त करोगे। मेरी प्रार्थना है की इस ब्लॉग के माध्यम से आप प्रभु को और जानोगे और उस प्रकार आशीष पाओगे। 

मेरी हिंदी बहुत कमज़ोर है। Google भैया के सहयोग से थोड़ा बहुत कोशिश कर रहा हूँ।  इसलिए गलतियों के लिए माफी मांगता हूँ।  और निवेदन है कि गलतियों को बताएं ताकि मैं आगे जाते हुए खुद को सुधर सकूँ। पढ़ने के लिए धन्यवाद। 

आपकी सेवा में,
यीशु का दास,
केलब 

मरकुस - दिन 28

कैसे पढ़ें? निर्देशों के लिए यहाँ क्लिक करें। पड़ने का भाग :  मरकुस 13 : 1 - 13   कठिन शब्दों : 1.  ढहा दिया जायेगा  : 40 सालों के बाद ईस...